Hindu Nav Varsh 2024: हिंदू नववर्ष उत्सव के पीछे का विज्ञान

By ADARSH UMRAO

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Hindu Nav Varsh 2024: हिंदू नववर्ष उत्सव के पीछे का विज्ञान

Hindu Nav Varsh का प्रथम दिन चैत्र शुक्ल १ प्रतिपदा
विक्रम सम्वत् – २०८१
(गत अंक मे कलि युगाब्द पर चर्चा हो चुकी है। इस अंक में विक्रम सम्वत् पर प्रकाश डाला जा रहा है।)

जब अंग्रेज ईसाई इस देश में प्रवेश किए , तो उन्होंने देखा कि भारत एक महान संस्कृति का उत्तराधिकारी है एवं एक गौरवशाली अतीत का स्वामी है। यदि इसे अपने इतिहास का बोध और अपनी वास्तविक महानता का ज्ञान हो गया , तो इस पर राज करना बहुत ही कठिन हो जाएगा । इसलिए धूर्त अंग्रेजों ने भारत के मर्म पर प्रहार करने का सुनियोजित षड्यंत्र रचा। इस दूरभिसंधि के अंतर्गत अंग्रेजों द्वारा भारत पर अनेक प्रकार के वैचारिक आक्रमण किए गए। उनमें से एक था – भारत की प्राचीनतम कालगणना को हटाकर अंग्रेजी कालगणना (ईस्वी सन) को लागू करना।

Hindu Nav Varsh गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस की रचना का प्रारंभ संवत् १६३१ से करते हैं। (इसका कारण यह है कि उस समय ईस्वी सन् भारत में लागू ही नहीं हुआ था।)

इसे वे रामचरितमानस में स्पष्ट रूप से लिखते भी हैं –
संबत सोरह सै इकतीसा।
करउं कथा हरि पद धरि सीसा।।
श्री हरि के चरणों पर सिर रखकर विक्रम संवत् १६३१ में इस कथा का प्रारंभ करता हूं।

विक्रम संवत् १६८०(1680) को ईस्वी सन में बदलने के लिए संवत् में से ५७(57) वर्ष घटाना पड़ता है , तब वह ईस्वी सन में बदल जाता है। अर्थात् संवत् १६८० = १६८० – ५७ = १६२३ (1623) ईस्वी सन।
इसका अर्थ यह हुआ कि ईसा मसीह के जन्म के पहले से अर्थात् ईस्वी सन प्रारंभ होने के 57 वर्ष पूर्व से विक्रम संवत् भारत में चल रहा था।

 Hindu Nav Varsh 2024: हिंदू नववर्ष उत्सव के पीछे का विज्ञान

ईसाइयों ने संपूर्ण कालखंड को दो भागों में विभाजित किया है। पहला – BC (बी०सी०) , ईसा के जन्म के पहले का कालखंड तथा दूसरा – AD (ए०डी०) ईसा के जन्म के बाद का कालखंड। ईसाईयों का इतिहास ईसा मसीह के जन्म से ही शुरू होता है।
जब हम यह कहते हैं कि आज 06 मार्च 2024 है , तो इसका अर्थ यह हुआ कि ईसा मसीह के जन्म का 2024वां वर्ष चल रहा है। लेकिन हमारा विक्रम संवत् तो ईसा मसीह के जन्म के 57 वर्ष पूर्व ही प्रारंभ हो चुका था। दो दिनों के बाद यानी 9 अप्रैल 2024 को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर विक्रम संवत् २०८१ (2081) हो जाएगा।

अब हम जानें कि विक्रम संवत् क्या है?

हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार संवत् चलाने का अधिकार उसी चक्रवर्ती सम्राट को होता था , जिसके राज्य में किसी भी व्यक्ति पर किसी भी प्रकार का कोई भी ऋण बकाया न हो। ऋणमुक्त साम्राज्य के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य के नाम पर विक्रम संवत् चलाया गया है।
सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक जिस तिथि को हुआ था , वह था – चैत्र शुक्ल१, प्रतिपदा का पावन दिवस। उसी दिन से विक्रम संवत का शुभारंभ हुआ।

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सम्राट विक्रमादित्य ने कभी राजकोष का धन अपने सुख के लिए खर्च नहीं किया। अपना परिवार चलाने के लिए भूमि के थोड़े से हिस्से में कृषि कार्य कर उत्पादन कर स्वयं उसी का सेवन करते थे। शिप्रा नदी से स्वयं पानी भरकर लाते थे , ऐसे थे वे संयमी संन्यासी सम्राट ! विक्रमादित्य ने 35 वर्ष राज किया था।
भारत की पश्चिमी सीमा पर हिंदूकुश के पास प्रथम शक्तिपीठ ” हिंगुलाक्ष माता का मंदिर ” और दूसरी ओर ब्रह्मदेश की सीमा पर शक्तिपीठ ” कामाख्या देवी का मंदिर ” स्थापित कर विक्रमादित्य ने भारत की सीमाओं को सामरिक दृष्टि से सुरक्षित बनाने का प्रयास किया था।

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ऐसे तेजस्वी , संयमी एवं पराक्रमी विक्रमादित्य को शत – शत नमन।

हम सभी सनातनी हिन्दुओं को यह बात अवश्य ही जानना चाहिए तथा इसे दूसरे बन्धुओं को भी बताना चाहिए।
Hindu Nav Varsh के शुभागमन चैत्र शुक्ल १ प्रतिपदा पर आप सभी को बधाई।

ADARSH UMRAO

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