ईश्वर द्वारा निर्मित दुनियां की सबसे सुन्दर रचना मानवीय शरीर

By ADARSH UMRAO

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ईश्वर

ईश्वर द्वारा निर्मित दुनियां की सबसे सुन्दर रचना याने मानवीय शरीर है ! ईस शरीर को हमारे शास्त्र और धार्मिक साहित्य मे देह, तनु, काया, रथ,मंदिर, क्षेत्र, दुर्ग (किला),पिंजरा,आदि नामों से निर्देशित किया है! महात्मा संत कबीर ईसे चादर कहतें हैं! ईस चादर रूपी शरीर को हमेशा साफ रखनें का संदेश महात्मा संत कबीर देते हैं! “चदरीया झिंनी रें झिंनी ..!” ” मैली चादर ओढ़ के कैसे!” यह उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ है ! यह शरीर नश्वर याने नष्ट होनेवाला है यह सत्य हम जानते हैं! वर्तमान कोरोना की लहरों ने तो यह कटु सत्य और भी उजागर किया है! किन्तु फिर भी ईस शरीर को मंदिर का पवित्र रुप भी माना जाता है! संतवचनो की दृष्टि से यह शरीर ही मंदिर और आत्मा ही ईश्वर है! जगद्गुरु भगवान आदि शंकराचार्य महाराज कहते हैं कि-” देहो देवालयतू प्रोक्तो,आत्मा तू परमेश्वरः! त्यजेत अज्ञान निर्माल्यं, सोहं भावोन पुजयेत् !!” – अर्थात शरीर देवालय और आत्मा ही परमेश्वर है, आंतरिक अज्ञान रूपी निर्माल्यं को त्यागकर अंतरंग सोहम् मंत्र द्वारा उस आत्मारुपी ईश्वर की पूजा करनी चाहिए! अर्थात देहालय हीं देवालय हैं!
☆ – अब शरीर को समझना होगा! यह शरीर पंचमहाभूतोद्वारा निर्मित हैं! पृथ्वी, जल,अग्नि, वायु और आकाश यहीं वह पंचतत्व है! मृत्यु के पश्चात “वह पंचतत्व में विलीन हो गयें ” ऐसी वार्ता लिखते हैं! अब ज़रा सोचिये ईन पांच तत्वों के स्वभाव कैसे हैं? पृथ्वी पानी का शोषण करतीं है याने पानी को पी लेतीं हैं और पानी पृथ्वी को अपने प्रवाह में बहा कर ले जाता है! अग्नि पानी को सुखाकर भांप बनाता हैं और पानी अग्नि को बुझा देता हैं! वायु कभी कभी अपने प्रभाव से अग्नि को दबोच लेता हैं, जैसे गैस विस्फोट और अग्नि अपनें प्रभाव से कभी-कभी वायु को समेटने का प्रयास करता है जैसे जंगल की भीषण आग! जंगल मे लगी आग की रुप से वायु अग्नि को और भड़काता भी है और कभी-कभी बुझाता भी है जैसे छोटे से दियें की बाती को हवा का झोंका बुझा देता है! और आकाश तो ईन चारों तत्वों को अपने बाहों में बांधने का सामर्थ्य रखता हैं ! तो इसप्रकार से यह पांचों तत्व एक-दूसरे को मात देकर हमेशा हार जीत के खेल में उलझे रहते हैं! यह परस्पर विरोधी स्वभाव वाले हैं! और ईन सभी को मिलाकर शरीर बना है तो सोचिये यह शरीर स्वस्थ कैसे रहेंगा? यदि शरीर को स्वस्थ निरामय रखना हैं तो शरीर का अभ्यास करना होगा! शरीर को ठीक से जानना होगा! भगवान श्रीकृष्ण ने गीताजी में ईसे क्षेत्र कहाँ है और इसे जानने वाले को क्षेत्रज्ञ याने सर्वज्ञ कहाँ है! भगवान ज्ञानेश्वर महाराज ने तो ईस देह का अत्यंत अनुपम और गहन चिंतन ज्ञानेश्वरी मे किया है!
हमे इस देह को श्रद्धा से मंदिर की तरह साफ़ शुद्ध रखना चाहिए! ईस देह में कफ, वात, पित्त रुपी त्रिदोष है और सत्व,रज, तम रुपी त्रिगुण भी है! ईन सभी का संतुलन रखना ही आधि – व्याधि रहित होना हैं! “व्याधि” और “आधि” ऐसे दो शब्द है! व्याधि याने शारीरिक रोग और आधि याने मन के रोग ! ईन दोनों रोगों से बचना याने “स्वस्थ ” रहना है!
आज की वर्तमान भयावह स्थिति मे जहां कोरोना के संकट ने सभी के मन मे एक दुसरे के प्रति अविश्वास और भय उत्पन्न कर दिया है! ऐसी स्थिति मे हम सभी को अपनें शरीर, बुद्धि और मन को पौष्टिक आहार देकर उन्हें सुदृढ़ बनाना आवश्यक है! क्यों कि जिसका शरीर,बुद्धि और मन सुदृढ़ और निरोगी है उसे व्याधि होतीं हीं नहीं, अपितु संसर्ग के कारणवश यदि वह व्याधिग्रस्त हो भी गया तों वह शारीरिक व्याधि से दुखी या चिंतित न होकर व्याधि से सामना करता है जिसमे व्याधि हार जातीं हैं! अब ईस शरीर, बुद्धि और मन को सुदृढ़ कैसे रखें?

●- शरीरधर्म- धर्म का एक अर्थ कर्तव्य भी होता है !शरीरधर्म अर्थात ईस शरीर का कर्तव्य !

यह शरीर अपने पंच कर्मेंद्रिय और पंच ज्ञानेंद्रियो द्वारा अपने कर्तव्य का वहन करता है! ईस शरीर को रथ कहां है, ईस रथ को इंद्रिय रुपी दस घोड़े होते हैं और ईनका लगाम होतां है मन, हमारी बुद्धि ईस देहरुपी रथ का सारथ्य करतीं हैं! हम सभी अपने शरीर के आधारसे ही जीवनभर तंदुरुस्त रहने की इच्छा रखते हैं! शरीर के आधार से हीं हम दिनभर याने २४ घंटे काम करते है किन्तु क्या हम कभी हमारे शरीर का अभ्यास करते है ? हम सुदृढ़ और सुखी रहने की इच्छा तो रखते हैं किन्तु सुदृढ़ और सुखी रखनें वाला आचरण नहीं करते जैसे प्रातःकाल जागना, नियमित व्यायाम आदि! ईसके विपरीत हम कभी दुर्बल और दुखी ना हो ऐसी हमारी इच्छा होती है किन्तु हमे दुर्बल और दुखी बनाने वाला आचरण हम करते है जैसे अनियमित दिनचर्या, व्यसन, निकृष्ट आहार आदि!
¤ – सुदृढ़ और बलवान शरीर मे ही निरोगी और सुदृढ़ मन का निवास होता है! यह शरीर हमे जीवनलक्ष्य प्राप्त करने के लिए ईश्वर द्वारा मिला हुवा एक उत्तम साधन है! यह हमे ईश्वर को ही वापस देना है! जैसे कि हम आवश्यकता होने पर हमारे पडोसी से कोई वस्तु लाते हैं और काम समाप्त होते ही उसे वह वस्तु वापस लौटा देते हैं ऊपर से उसका धन्यवाद भी करते हैं! ठीक उसी प्रकार हमे यह शरीर ईश्वर को वापस देना ही है,किन्तु ईश्वर ने हमे जैसा सुदृढ़ और सुंदर शरीर दिय़ा था क्या हम उसे उसी प्रकार सुंदरता के साथ लौटा सकते हैं?
महात्मा संत कबीर कहतें हैं “तुने मुझको जग में भेजा निर्मल देकर काया!आकर के संसार में मैंने इसको दाग़ लगाया !” ईस सुंदर काया को कोई दाग़ ना लगें इसलिए हमे शरीर धर्म का पालन करना होगा!

●- शरीर को निरोगी और सुदृढ़ रखनें हेतु कुछ नियम १)

– नियमित व्यायाम- हम प्रतिदिन जीस शरीर के आधार से २४ घंटे काम करते है उस शरीर के लिए हमने प्रतिदिन कम से कम २४ मिनट समय निकालकर व्यायाम करना चाहिए!
२) – नियमित योग्य आहार- हमारे जीवन मे आहार का सर्वाधिक महत्व है! जैसा अन्न वैसा मन और जैसा पानी वैसी वाणी ऐसा कहतें हैं! भोजन को हिन्दू धर्म मे यज्ञकर्म कहाँ हैं! भोजन करने का समय निश्चित होना चाहिए! भोजन करते समय बातचीत ना करे,दूरदर्शन पर प्रसारित फिल्म या सिरियल, न्यूज़ आदि देखते हुए भोजन ना करें! भोजन बैठकर, प्रसन्नता से और मन लगाकर शांति से ग्रहण करना चाहिए!
३) – निर्व्यसनी दिनचर्या- हमारा प्रतिदिन का व्यवहार नियमित रूप से चलने के लिए हमारी दिनचर्या निश्चित होनी चाहिए और मादक पदार्थ, धुम्रपान आदि व्यसनों से शरीर का शीघ्र नाश ही होता है इसलिए ऐसी व्यसनों से दुर रहना चाहिए!
४) – आवश्यक उतनी ही किन्तु गहरी निद्रा – निद्रा याने नींद यह मानव जीवन को एक वरदान है! निद्रा को हीं शास्त्रों में नित्यप्रलय कहाँ हैं! हम सभी प्रतिदिन सोते हैं ईसी कारण इतनें वर्षों तक जिंदा रहते हैं! दिनभर के कामों से,परिश्रम से, शरीर मे अनावश्यक अतिऊष्ण पेशीकाए निर्माण होतीं हैं ! थकान महसूस होती हैं! गहरी निद्रा से वह पेशीकाए भस्मसात होतीं हैं और सुबह नई ऊर्जा और उमंग की अनुभूति होती है! किन्तु ईस उमंगभरी अनुभूति के लिए गहरी नींद आवश्यक है! अधिक नींद आना और बिलकुल नींद न आना यह दोनों दुर्बलता के लक्षण हैं! रात्री को समय पर सोना और सुबह प्रातःकाल मे जागना यह आरोग्यदायी होता है!
५) – आवश्यक उतने ही नियमित शारीरिक परिश्रम- उत्तम स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन शारीरिक परिश्रम आवश्यक है! खेतों में काम करने वाले किसान एवं परिश्रम करने वाले अन्य बंधुओका शरीर निरोगी होता है और उनकी रोगप्रतिकारक क्षमता भी अधिक होतीं हैं! अन्यत्र समाज मे सुख-सुविधाओंके के अनावश्यक साधन सहजता से मिलनें के कारण आलस्य बढ़ रहा है! ईसी कारण से बीमारियां, रोग बढ़ रहें हैं! अधिक सुविधाओं के कारण शरीर बहोत दुर्बल हो रहा है! जबतक डाॅक्टर सलाह नहीं देते तबतक कोई सुबह उठकर घुमने भी नहीं जाता है! इसीलिए प्रतिदिन थोड़े शारीरिक परिश्रम आवश्यक है! किन्तु परिश्रम (Exertion) याने व्यायाम (Exercise) नहीं है यह ध्यान रखना है ! सामान्यतया ईन नियमों का पालन करने से हम हमारा शरीर सुदृढ़ और निरोगी रख सकते हैं!

● – सुबुद्धि का सामर्थ्य- बुद्धि बहुत सामर्थ्यशाली होती है!

इसीलिए वह ईस देहरुपी रथ की सारथी होतीं हैं! हम सभी जानते है की चालक यदि कुशल रहा तो वह गाड़ी को योग्य मार्ग से निर्धारित समय मे गंतव्य स्थान पर सुखरुप पहुंचाता हैं! ईस देहरुपी रथ मे सारथी रुपी बुद्धि का अधिक महत्व है! बुद्धि सदैव लगाम रुपी मन को खींचकर इंद्रिय रुपी घोड़ों को नियंत्रित करने का प्रयास करतीं हैं! अपितु हमने बुद्धि को पौष्टिक आहार देकर उसे कुशाग्र और सतेज रखा तो वह योग्य दिशा से शरीररुपी रथ को कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाती हैं! ऐसा होने से जीवन सार्थक होता है!
बुद्धि का सामर्थ्य प्रचंड होता हैं! मुद्राराक्षस नामक ऐतिहासिक नाटक में महाबुद्धिमान आचार्य चाणक्य कहतें हैं- ” एका केवलमर्थसाधनविधौ सेना शतभ्योऽधिका ! नन्दोन्मूलन द्रष्टवीर्यमहिमा बुद्धिस्तु मा गान्मम् !!” अर्थात जिन्हें छोड़कर जाना था वह चलें गयें, जिन्हें छोड़कर जानें की इच्छा हैं वह भी निकल जाएं, चिंता करने की कोई बात नहीं है किन्तु अपना ध्येय प्राप्त करनें के लिए जो सौ सेनाओंं से अधिक बलवती हैं और नंदसाम्राज्य के उन्मूलन कार्य में जिसके शौर्य का महिमा विश्व ने देखा है वह मेरी बुद्धि केवल मुझे छोड़कर नहीं जानीं चाहिए!” ऐसी बुद्धि की महिमा है ! बुद्धि तों सभी के पास होतीं हीं हैं बस उसका उपयोग हम अपनी-अपनी क्षमतासे कम अधिक करते हैं! ऐसा कहतें हैं कि यदि किसी का पतन होना है तों उसका दैव उसकी बुद्धि को संभ्रमित कर देता है! फिर भ्रमित बुद्धि से उसका आचरण बिगड़ जाता है परिणाम वश वह मान,सम्मान, नैतिकता, आत्मविश्वास अपनें हीं आचरण से गँवा देता है! हम सभी व्यवहार में देखते हैं कि जब ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा कोई जघन्य अपराध होता हैं तो लोग कहते है “उसकी तों बुद्धि ही भ्रष्ट हो गई है!” ऐसी हमारी महत्वपूर्ण बुद्धि कभी भ्रष्ट ना हो, हमारा कभी बुद्धिभेद ना हो, बुद्धि भ्रमित ना हो इसलिए हमे सदैव जागृत रहना चाहिए!

● – बुद्धि को सुदृढ़ और निरोगी रखनें हेतु कुछ नियम-

१)- पौष्टिक अध्ययन – पढ़ना यह बुद्धि का पौष्टिक आहार माना जाता है! समर्थ रामदास स्वामी कहतें हैं ” प्रसंगी अखंडित वाचीत जावे !!” अर्थात हमे अखंडित याने निरंतर, प्रतिदिन कुछ अध्ययन अवश्य करना चाहिए! हमे हमारी बुद्धि को सुबुद्धि बनाकर रखनें हेतु यह आवश्यक है ! प्रतिदिन कुछ अवश्य पढ़ना चाहिए! नियमित सद्विचार, सद्ग्रंथ, संतसाहित्य, महापुरुषों के जीवन चरित्र पढ़ने चाहिए!
२)- नियमित लेखन – तज्ञ महानुभावोंके मतानुसार बुद्धि का जितना अधिक उपयोग होता है उतना अधिक बुद्धि का विकास होता हैं! समर्थ रामदास स्वामी कहतें हैं “दिसामाजी काहीतरी ते लिहावे!”अर्थात प्रतिदिन कुछ लिखना चाहिए!नियमित रुप से सद्विचार और अपने मन का मनन, चिंतन लिखकर रखना चाहिए! नियमित वाचन,मनन,चिंतन और लेखन इस चतुःसूत्री से हमारे बुद्धि की वैचारिक बैठक पक्की होतीं हैं!
३)- श्रवण की रुचि – श्रवण याने सुनना यह बड़ी मौलिक बात है! सुनने का स्वभाव अच्छा माना जाता है! गुरु नानक देव जी कहतें हैं “एक ने कहीं दुजे ने मानीं – नानक कहें दोनों ग्यानी!”सुनने से समझदारी भी बढ़ती है ! हमे अध्यात्मिक प्रवचन, प्रगल्भ वक्ताओंके दर्जेदार भाषण सुनने चाहिए! एक अच्छा लेखक या अच्छा वक्ता बनने के लिए पहले अच्छा श्रोता होना आवश्यक है!
४)- वक्तृत्व गुण – वक्तृत्व याने अपने विचार मर्यादित शब्दों मे और मर्यादित समय में सबके सामने रखना! वक्तृत्व का व्यक्तित्व मे बड़ा महत्व होता हैं! शब्दों का सामर्थ्य प्रचंड होता हैं क्यों कि शब्द ब्रह्म होते हैं! एकबार शब्द प्रसन्न हो गयें तो सारे विश्व को मोहित करनें का सामर्थ्य प्राप्त होता हैं! ऊदा. स्वामी विवेकानंद.
५)- बौद्धिक खेल – स्मरण शक्ति बढ़ाने वाले खेल खेलना, जैसे प्रश्नमंजूषा, नियमित कुछ श्लोक, ओवी,मंत्र, दोहे आदि कंठस्थ करनें का अभ्यास करना! समाचार पत्रों मे आनेवाली शब्दपहेलीया भरना, शब्दोकी अंताक्षरी खेलना आदि. सामान्यतया ईन नियमों का पालन करनें से बुद्धि सकारात्मक, कुशाग्र एवं निरोगी रहतीं हैं!

● – मन का महात्म्य –

ईस देहरुपी रथ का सारथी भले ही बुद्धि हो किन्तु नायक मन ही होता हैं!मन बहुत चंचल होता हैं वह अपने चांचल्य से बुद्धि को सदैव शह प्रतिशत देता हैं! मन बलवान होंने के कारण सभीपर उसीका राज चलता है ! हम भी मन के ही मनोरथ मे रमते है! मनद्वारा खड़ी होनेवाली सीढ़ियों पर हम सदैव चढ़ते उतरते रहते हैं! ” मेरे मन मे विचार आया ” ” वह मेरे मन से उतर गया ” “मेरा मन दुखी हो गया ” ” ऐसा मेरे मन में नहीं था ” यह हमारे नित्य व्यवहार के उद्गार हैं!ईस मन को समझना कठिन हैं!मन का वेग अद्भुत है! मन की गती को नापना कठिन है! हमारे रोगों का कारण भी मन हीं होता हैं! आधि याने मन के रोग और व्याधि याने शरीर के रोग यह हमनें पहले भी पढ़ा है ! कोई भी रोग प्रथम मन को होता हैं फिर उसके लक्षण शरीर पर दिखते हैं!
हमारा मन जैसे सोचता है वैसा हीं परिणाम हमारे शरीर पर होता हैं! जैसे कि “मै अब पहलें जैसा तंदुरुस्त नहीं रहा अब मैं कमजोर हो गया हूँ!” ” मुझे खाना हज़म नहीं होता!” “मै बिमार हूँ!” ” मैं जादा चिढ़ता हूँ!” ” मुझे जल्दी क्रोध आता हैं!” “मेरी भावनाओं को कोई नहीं समझता!” “मेरा कोई नहीं सुनता!” “मेरी चिंता करनेवाला कोई नहीं हैं!” “मेरा कोई सही ईलाज भी नहीं करवाता!” ” मेरा कोई महत्व ही नहीं रहां!” “मेरे कारण सभी को कष्ट होता हैं!” “मै बिल्कुल अकेला पड़ गया हूँ!” ऐसे विचार बार बार मन मे आना यह मन बिमार होने के लक्षण हैं! ऐसे बिमार मन का परिणाम धीरे धीरे शरीर पर होता हैं!फिर शरीर बिमार होने लगता है! क्यों कि स्वस्थ और सुदृढ़ मन मे ऐसे नकारात्मक विचार आते ही नहीं!
महान मनोवैज्ञानिक योगवशिष्ठकार भगवान श्रीराम को समझाते हुए कहते हैं कि ” नायंजनोमे सुखदुःखहेतूर न देवतात्माग्रहकर्मकालः! मनंपरमकारणम् मामनन्ति संसारचक्रमपरिवर्तयेद्यत् !! – अर्थात हमारे दुःख का कारण देवता, आत्मा, ग्रह, काल यह नहीं है अपितु दुःख का मूल कारण अपना मन हीं होता हैं! मनकी शक्ति से हीं यह संसार चक्र चल रहा हैं! जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज कहते हैं कि ” मन करा रे प्रसन्न!सर्व सिद्धिचे कारण !!” अर्थात मन को सदैव प्रसन्न रखना चाहिए क्यों कि मन हीं सभी सिद्धियों का कारण हैं! ईस मन को समझना और संभालना ईसी हेतु से संतों ने महान उपदेश दियें हैं! गीताजी में स्वयं भगवान ने ” मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्करु!” ईस युक्तितत्व को दो बार दोहराया है ! इसका अर्थ है,”हे अर्जुन ! तू मुझे हीं अपना मन बना ले ! अपना मन मुझे सौंप दे! सर्वत्र मुझ एक को हीं नमस्कार कर!”

ईश्वर
तों ऐसा यह अतिचंचल मन जो अपनें आपमें कई दृश्य, कई संसार बनाता भी है और मिटाता भी हैं!ईस मन को संकल्प – विकल्प की स्थिति में कैसे संभालें? ईसे सदैव शुद्ध कैसे रखें? यह समझाने के लिए अपने देश के महानतम मनोवैज्ञानिक ॠषिमुनी,संत महात्मा ओंने अपने श्रेष्ठतम अनुसंधान से स्वानुभूति के आधार पर मन का प्रबंधन लिखकर रखा हैं! ऐसे ईस मन का विस्तार अनंत हैं!

●- मन को सुदृढ़ और निरोगी रखनें हेतु कुछ नियम-

१)- ध्यान- ध्यान यह मन का सर्वोत्तम पौष्टिक आहार माना जाता है! ध्यान का वर्णन नहीं किया जाता हैं! यदि ध्यान करना याने क्या करना?ऐसा पूँछा जाय तों यह प्रश्न हीं ग़लत हैं क्यों कि कुछ भी नहीं करना याने ध्यान हैं! ध्यान करनें का पूर्वाभ्यास किया जाता हैं वह भी महत्व का हैं, किन्तु वह ध्यान नहीं होता! ध्यान लगाना नहीं पड़ता, ध्यान लग जाता हैं!
२)- पूजा, जप,मंदिर दर्शन (उपासना) – कुछ लोग नियमित मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं ! जप करते है, पूजा करते हैं! कुछ लोग तों मंदिर मे नहीं जातें किन्तु मंदिर के सामने अपनी गाड़ी की गती कम करके हाॅर्न बजाकर भगवान की ओर देखकर श्रद्धा से गर्दन झुकाते हैं! तों कुछ रास्तेपर हीं अपनी चप्पल ऊतारकर श्रद्धा से हात जोड़कर प्रणाम करते हैं! उन्हें यदि पुछा की ऐसा क्यों करते हो? तो कहते हैं कि ” मन को अच्छा लगता हैं यहीं हमारा नियम हैं!” कुछ उपासना करनें से मन प्रसन्न होता हैं! ऐसी उपासना मनारोग्य के लिए आवश्यक हैं!
३)- सेवा-सुश्रुशा – माता-पिता, बिमार रुग्ण,वयोवृद्ध जन,दिव्यांग व्यक्ति, संत,महात्मा, सद्गुरु ईन सबकी निस्वार्थ भाव से सेवा करना यह भी मन का उत्तम आहार हैं! ऐसी सेवा से मन का अहंकार नष्ट होता हैं! मन प्रसन्न होता हैं! भूख से व्याकुल व्यक्ति को प्रेम से भोजन खिलाना, ग्रिष्म ॠतू की तडपती धूप मे प्यासे जीव को ठंडा पानी पिलाना, हेमंत ॠतू मे जाड़े से सिकुड़ते
व्यक्ति के तन पर गरम शाल ओढ़ने को देना! यह करते वक्त सामनेवाले व्यक्ति के चेहरे पर का आनंद यह हमारे लिए दुनियां का सबसे बड़ा पुरस्कार होता हैं! यह सेवा भी मन का श्रेष्ठ आहार हैं!
४) – सकारात्मक चिंतन – हमारे द्वारा किये जाने वाले कर्मों के समान ही हमारा चिंतन भी बहुत महत्वपूर्ण होता हैं! भगवान बुद्ध कहते हैं कायिक पाप के समान ही हमारा मानसिक पापं भी फल देता हैं! हमारे जीवन का आधार क्या है,? किसके बिनां हम जी नहीं सकते? ऐसा सोचते हीं ध्यान में आतां हैं की हमारा विचार करना याने सोंचना हीं जीवन का आधार हैं! हम एक भी क्षण निर्विचार नहीं रह सकते! हम हमेशा सोच के लिए जीते है और ज़ीने के लिए सोचते हैं! मन मे एकही दिंन मे हजारों विचार आते-जाते हैं!श्रेष्ठ मनीषी जे.कृष्णमूर्ति कहतें हैं “हम हमेशा विचारों के सहारे, विचारों के लिए विचारों में जीते हैं!” यह हमारी सोच याने चिंतन यदि हमारे जीवित रहने का कारण हैं, तो हमारा चिंतन सदैव सकारात्मक होना चाहिए! गोस्वामी तुलसीदासजी अपने श्रीरामचरितमानस मे एक प्रसंग का वर्णन करते हैं! युध्द के पश्चात स्वर्ग के देवता प्रभु श्रीरामचन्द्र जी का पुष्प वृष्टि कर स्वागत करते हैं! और ईस शुभ अवसर पर कुछ वरदान मांगने को कहते हैं! प्रभु कहतें हैं “ईस युध्द भूमि पर अमृत वर्षा होनी चाहिये!” फिर अमृत वर्षा होते हीं एक चमत्कार होता हैं! ” सुधा वृष्टि हूई दूई दल उपर-जागे भालु,कपी नहीं रजनीचर!” अर्थात अमृत वर्षा दोनों दलों पर हूई किन्तु केवल भालु और कपी याने वानर उठ गयें किन्तु एक भी राक्षस नहीं उठा! हनुमान जी के मन में आया कि सुधा वृष्टि तों दोनों दलों पर हूई किन्तु कोई भी राक्षस क्यों नहीं उठा? उन्होंने प्रभु से पूछने पर श्रीरामचन्द्र जी ने मंदिर मुस्कुराते हुए कहा ” प्रिय हनुमान! यह जो जीवित होकर उठे हैं सब मेरे भक्त हैं! केवल मेरे लिए इन्होंने अपना जीवन त्यागकर मृत्यु को स्वीकार किया था ! किन्तु ईस रणभूमिपर जब तक यह लड़ते रहें तबतक इनके मुख में और मन में रावण का नाम था “मुझे रावण दिखाओं उसे मैं मारुंगा! ऐसा कहतें कहतें इन्हें मृत्यु आया! जिनके मन में मृत्यु के समय पर कुबुद्धि रावण का चिंतन होगा उन्हें पुनर्जन्म तों मिलेगा हीं! ईसी के विपरीत यह सभी राक्षस बड़े निर्दयी थे,दुष्ट थे किन्तु लड़ते लड़ते यह सभी मन में केवल मेरा चिंतन कर रहें थें! ” मुझे राम दिखाओं, मुझे राम दिखाओं, उसे मैं मारुंगा!” ऐसा कहतें कहतें इन्हें मृत्यु आया! उन्हें तों मोक्ष मिला,फिर वह कैसे उठेंगे? इसलिए हमारा चिंतन बड़ा महत्वपूर्ण होता हैं, हमें सदैव सकारात्मक और अच्छा हीं सोंचना चाहिए!

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काम, क्रोध, मोह, लोभ,ईर्ष्या, द्वेष यह मन के छह शत्रु मानें जातें हैं ईनको हीं षडरिपु कहतें हैं! वैसे हीं पंचक्लेष होते हैं- अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश यह पांच प्रकार के क्लेश होते हैं यह सब मन को पीड़ा,दुख देते हैं! ईन सभी विकारों से मन को बचाना चाहिए क्यों कि यहीं विकार मन में कुविचार रुपी कूडा-कचरा ज़मा कर के उसे संभालते रहते हैं! ऐसे बुरे विचार व्यक्ति को मनोरुग्ण बनाते हैं! सकारात्मक चिंतन ईन सभी विकारों से मन का रक्षण करता है!
५) – मनोरंजन – मन को रंजन याने रमना अच्छा लगता है, मन को भाने वाला मनोरंजन हर मन को चाहिए क्यों कि मन रसिकता में रस लेता हैं! गायन, वादन,नृत्य, संगीत, चित्रकला आदि कलाओं में मन सहजता से रमता है! कुछ साधक तों कलागुणों की नादब्रह्म भक्ति के रुप में साधना भी करते हैं ! सामान्यतया सभी को अपनें पसंदीदा गानें सुनना, अपना पसंदीदा संगीत, नृत्य देखना,शास्त्रीय संगीत, रागरागीणी को सुनना अच्छा लगता है! ऐसा करने से मन आल्हादित होता हैं! मनोरंजन मन के नैराश्य को चुटकियों मे भगा देता हैं! कला के अविष्कार से हर चेहरेपर हास्य खिलता है! मनोरंजन यह भी मन का उत्तम आहार हैं!
वर्तमान स्थिति में हम सभी कोरोना रुपी मायावी संकट से लढ रहें हैं! शद्बो के अर्थ भी कोरोना ने बदल दियें हैं जैसे की “पाॅजिटिव होना” पहले सब एक दूसरे को समझाते हुए कहते थें हमेशा पाॅजिटिव रहना चाहिए! किन्तु आज किसी को पाॅजिटिव रहों ऐसा कहना तों उसे शाप देने जैसा हीं लगता है! समाज मे एकात्मता बनी रहे इसलिए आपस की दुरिया कम करों एक दुसरे से मिलों ऐसा कहाँ जाता था ! आज सामाजिक दुरी की बात होतीं हैं, एक दुसरे के संपर्क मे मत रहो ऐसा कहाँ जाता हैं! ईस स्थिति में एक अलग सी अस्पृश्यता का भाव निर्माण होंने की संभावना लगतीं हैं! हमे तों अपने समाज को कुरीतियों से बचाकर एकता के, स्नेह के सूत्र में बांधना हैं! इसलिए समाज मे समरसता का भाव निर्माण करना हैं!
ऐसी विपरीत परिस्थितियों में हमारे मन का आत्मविश्वास कम नहीं होना चाहिये! ईस कोरोना से भी अधिक घातक एक विषाणु है जिसका नाम है – “भय” ! केवल भय के कारण भी लोगों की मृत्यु हो रही है! भय व्यक्ति को परावलंबी और दुर्बल बनाता है ! इसलिए ईश्वर ने गीताजी मे दैवी गुणों का वर्णन करते हुए प्रारंभ हीं “अभय” से किया है! अभय यह सदगुणों का सेनापति हैं! हम सभी अभय होकर अपनें शरीर, बुद्धि और मन को सुदृढ़ और निरोगी रखे ! और हमे जीवन में कभी भी –
“तुने मुझको जग मे भेजा निर्मल देकर काया!आकर के संसार मे मैने ईस को दाग़ लगाया ! जनम जनम की मैली चादर कैसें दाग़ छुडाऊ !!” ऐसा कहने की नौबत न आए ! ईसलिए हम पहलें अपने शरीर को मंदिर के समान स्वच्छ और शुद्ध बनाएँ फिर आत्मा रुपी ईश्वर के दर्शन तों होंगे । चंद्रिका दीक्षित (वरिष्ठ पत्रकार)

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